अजमेर में ख्वाजा साहब का उर्स

राजस्थान के हृदयस्थल में बसा अजमेर पृथ्वीराज चैहान के समय से ही अत्यन्त महत्वपूर्ण नगर रहा है। यहाँ का तारागढ़ किला अरब, मुगल और मराठों के आक्रमणों का मूक साक्षी है। इसी शहर में 19 जनवरी 1616 को शहनशाह जहाँगीर ने ब्रिटेन के जेम्स प्रथम के राजदूत सरथाॅमस रो के साथ किए गए समझौते के अन्तर्गत भारत में व्यापार करने की अनुमति प्रदान की थी। अजमेर से 11 कीलोमीटर दूर स्थित पुष्कर तीर्थों का राजा माना जाता हैं। इस तीर्थ के साथ ही अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन की विश्व विख्यात दरगाह के कारण इस नगर का गौरव द्विगुणित हो गया है।
गरीब नवाज के नाम से प्रसिद्ध, ईरान के संजार नगर में जन्मे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने बचपन में ही पवित्र कुरान को कंठस्थ कर लिया था। वे दरिद्र, रूग्ण और विकलांगों की दशा देखकर द्रवित हुए। अपनी आटे की चक्की तथा बगीचे को बेचकर उन्होनें वह राशि जरूरतमंद लोगों में बाँट दी और स्वयं ने संसार को त्याग दिया। ज्ञान की खोज में उन्होनें दूर-दूर भ्रमण किया। बुखारा और बगदाद में इस्लाम धर्म का अध्ययन करने के पश्चात् उन्होनें बहुत सी आध्यात्मिक हस्तियों के मार्गदर्शन में पूर्णत्व प्राप्त किया। कहा जाता है कि
मदीना में उन्हें दैविक आदेश मिला कि भारत जाकर वहाँ अपने पवित्र मिशन का कार्य करें। वे शहाबुद्दीन गौरी के साथ अजमेर पधारे और बावन वर्ष की आयु में उन्होनें इस नगर को अपनी सिखावनियों का केन्द्र बनाया।
ख्वाजा साहब सूफी मत के चिश्तिया सम्प्रदाय के संस्थापक थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि निर्धन तथा दलित मनुष्यों की सेवा करना और उन्हें राहत पहुँचाना ही ऐसी पूजा है जिससे ईश्वर सर्वाधिक प्रसन्न होता है। ईश्वर के बनाए सभी प्राणियों के प्रति उनके मन में सच्चा प्रेम व सहानुभूति थी। उनकी शिक्षाओं का प्रभाव आज भी सभी धर्मों और मतों के लोगों पर देखा जा सकता है। उनकी आध्यात्मिक निष्ठा और धार्मिक तथा नैतिक चरित्र का गहरा प्रभाव हिन्दुओं तथा सिखों पर भी पड़ा। इस सन्त के उपदेश सार्वभौमिक है। बड़ी संख्या में गैर-मुसलमान दरगाह पर आते हैं और अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना करते हुए तथा मनोकामना पूर्ण होने पर फूल, मिठाई या चादर चढ़ाते हुए देखे जा सकते है। दरगाह क्षेत्र के कुछ हिन्दु दुकानदारों को व्यापार प्रारंभ करने से पूर्व प्रातः अपनी चाबियों को श्रद्धा अर्पित करने के रूप में दरगाह की सीढ़ियों पर रगड़ते हुए देखा जा सकता है।


दरगाह में होने वाली कुछ विशिष्ठ रस्में हिन्दु रीतियों के समान हैं। सन्त
की मज़ार पर प्रति प्रातः चढ़ाया जाने वाला चन्दन पीढ़ियों से एक हिन्दु परिवार द्वारा तेैयार किया जाता है। दरगाह के नक्कारखाने में बजने वाली शहनाई, भंडारे के समान बँटने वाला लंगर तथा जायरीनो को सम्मान के रूप में सरोपा प्रस्तुत करना आदि कुछ ऐसी रस्में है जो अन्य मुस्लिम धर्म स्थानों पर नहीं देखी जातीं। यह धार्मिक समन्वय का एक अनोखा उदाहरण है।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अपनी देह सत्तानवें वर्ष की आयु में त्यागी थी। इसके दो सौ साल पश्चात् सुल्तान महमूद खिलजी ने उनकी कब्र को पक्का करवाया था। फिर 1567 ईस्वी में शहनशाह अकबर ने इस स्थल को पुनः बनवाया। कब्र के निकट एक चाँदी के डिब्बे में वह पवित्र कुरान रखी है जिसका ख्वाजा साहब उपयोग करते थे। मज़ार की संगमरमर की छत के ऊपर सोने का गुम्बद लगा है। मज़ार के अन्दर के भाग को स्वर्ण तथा बहुमूल्य पत्थरों से सुसज्जित किया गया है और दीवारों पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं।
गरीब नवाज के देहान्त की सही तिथी ज्ञात नहीं है क्योंकि उन्होनें अपने आपको ध्यान तथा प्रार्थना करने के लिए एक छोटे कक्ष में बन्द कर लिया था और 6 दिन बाद जब उनके शिष्यों ने उसका दरवाजा खोला तो पाया कि वे इस संसार को छोड़ चुके थे। इसलिए उनका सालाना उर्स रजब माह के पहले से छठे दिन तक 6 दिन मनाया जाता है। उर्स के मौके पर तो दरगाह का आलम अजीबोगरीब हो जाता है। पेशावर के पीर द्वारा भेंट किए गए झँडे को फहराकर उर्स की रस्मों की शुरूआत होती है। अकबरी मस्जिद में दुआऐं की जाती हैं। यह मस्जिद अकबर ने अपने पुत्र जहाँगीर के जन्म लेने पर बनवाई थी। उनका विश्वास था कि उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर ख्वाजा साहब ने उन्हें जहाँगीर के रूप में पुत्र रत्न की भेंट दी थी। जहाँगीर के जन्म के पश्चात् अकबर ने अपने वादे के अनुरूप आगरा से अजमेर की पैदल तीर्थ यात्रा की। शाहजहाँ द्वारा बनाई गई संगमरमर की विशाल जहाँगीरी मस्जिद में धार्मिक प्रवचनों तथा दुआओं का आयोजन होता है। रात्रि के समय भव्य इतालवी झाड़फुनुसों से सजे विशाल महफिलखाने में देशभर के प्रसिद्ध कव्वाल इस महान सन्त की तारीफ में लिखी कव्वालियाँ पेश कर लोगों को भाव-विभोर कर देते हैं।
सुन्दर मज़ार से कुछ दूरी पर निज़ाम (बाबा साका) भिश्ती की मज़ार है जिसने बादशाह हुमायूँ को नदी में डूबने से बचाया था। कहा जाता है कि औरंगजेब ने जब पहली बार दरगाह की जियारत की तो उसने इसे ख्वाजा साहब का मज़ार समझ लिया। जब उसे बताया गया कि वह तो वास्तव में बाबा साका की कब्र थी तो उसने आदेश दिया कि उसके ऊपर के रेशमी छत्र को हटा दिया जाए तथा कब्र में जड़े हीरे जवाहरात निकाल लिए जाऐं।
दरगाह में एक अत्यन्त दर्शनीय रस्म होती है देग लूटना। लगभग 8000 ओर 2500 पाउण्ड क्षमता वाली दो देगों में मीठा, मेवा व अन्य वस्तुऐं मिलाकर चावल पकाया जाता हैं। यह सामग्री प्रायः धनी भक्तों द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। चावल पकना सायंकाल जल्द ही प्रारंभ हो जाता है। रात भर पकने के पश्चात् पौ फटने पर देगों पर लगे ढक्कन को हटाया जाता है। तेज गर्म भाप के निकलने की प्रतीक्षा किए बिना ही पीरजादा, जिन्हें लूटने का पारम्परिक अधिकार प्राप्त है, इस गर्म खाद्य सामग्री को जल्दी-जल्दी लूट लेते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस रस्म में जलने अथवा झुलसने की कोई दुर्घटना नहीं होती।
सन्त के अमीर भक्त दरगाही परिसर में मुक्तहस्त से दान देते है। इसलिए वहाॅं बड़ी संख्या में फकीरों का गुज़ारा हो जाता है। फकीरों को वर्ष भर लंगर बँटता है। उनके लिए तो यह स्थल स्वर्गतुल्य है।
सालाना उर्स की जुम्में की बड़ी नमाज के तुरन्त बाद देश भर से आए विभिन्न वर्ग के फकीरों का शाही दरबार लगता है। वे अपना बादशाह चुनते है, भव्य जुलूस निकालते है और महफिलखाने में गरीब नवाज से दुआएँ माँगते हैं।
उर्स जैसे विशेष अवसरों पर बहुत बड़ी संख्या में लोग शुक्रवार की नमाज़ में भाग लेते हैं। दरगाह परिसर का कोैना-कौेना और उसके आसपास का सारा क्षेत्र तो खचाखच भर ही जाता है। रेलवे स्टेशन तथा सुभाष बाग तक की सड़कों पर भी नमाजी अपना स्थान ढूंढ लेते हैें उर्स के छठे दिन फातीया नमाज के पश्चात् सब रस्मों का समापन हो जाता हंेंै।
उदास मन से घर लौटते जायरीन यही दुआ करते हैं कि ख्वाजा उन्हें फिर बुलाऐं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *